ग़ाज़ीपुर

खत की सोंधी यादें-पूरी दुनिया संवेदनहीनता की अंधी दौड़ में शामिल होने को बेताब

सच्ची और भावुक अभिव्यक्ति चिट्ठियों में ही दिखाई देती

गाजीपुर।मन में एक दूसरे के प्रति उठने वाली भावनाओं की सबसे ईमानदार,सच्ची और भावुक अभिव्यक्ति चिट्ठियों में ही दिखाई देती है। आप भी सोच रहे होंगे कि अचानक ये खत की कहां से बात आ निकली? दरअसल कल मेरी व्यक्तिगत लाइब्रेरी में पुरानी किताबों को पोछने झाड़ने से कई खत बाहर आ गिरे तो खत को देखते ही मेरी यादों का दरीचा खुलने लगा।मुझे याद पड़ता है कि जब मैं गाँव में रहा करता था तो प्रतिदिन डाकिये को देखकर यही उम्मीद करता था कि शायद मेरा खत आया होगा। मेरी ही तरह गाँव के लगभग सभी ऐसा सोचा करते थे। मैं हफ्ते में दो तीन खत तो लिखा ही करता था और उसका जवाब भी आता था। जब मैं खत पाता तो दिल में हजार उमंगे जाग उठती थीं मगर मुझे आज कोई चिट्ठी लिखने वाला नहीं है।जब मैं घर से दूर रहकर पढ़ाई कर रहा था तो अम्मी_अब्बू खत लिखा करते थे कि “बेटा! खाना वक्त पर खा लिया करना, नमाज पढ़ते रहना, दिल लगा कर पढ़ना, उस्ताद की इज्जत करना, छोटी बहन तय्यबा तुम्हें याद करती है, भाई जान, भाभी और बहीनी तुम्हे दुआ कह रहे है, परंसो हम नाना-नानी के यहाँ जा रहे है,चचा और मामू के यहाँ भी खत लिखकर खैरियत ले लेना वगैरह।संबंधों की डोर से हम आज भी वैसे ही बंधे हैं फिर हमें क्या हो गया है? माँ-बाप का प्यार वैसा ही है, आकाश की ऊंचाई और आँगन में आने वाली धूप का कलर पहले जैसा ही है, फिर रिश्तों को जोड़ने वाली खतों की इबारत कहाँ गुम है? अब हम कभी कभार वॉट्सएप कर लेते हैं है, बहुत किसी पर प्यार आया तो मोबाइल से तीन-चार मिनट बतिया लेते हैं। लेकिन हम सभी जानते है कि वॉट्सएप या टेलीग्राम में अम्मी का प्यार और फूफी (बुआ) का दुलार आ ही नहीं सकता। पर कोई करे भी तो क्या?
पूरी दुनिया संवेदनहीनता की अंधी दौड़ में शामिल होने को बेताब है। हम भी उसका हिस्सा बनते जा रहे है। अगर हम उसमें शामिल नहीं हुए तो लोग हमें जाहिल गंवार और न जाने क्या-क्या कहने या समझने लगेगें। हमको मालूम है कि वॉट्सएप चैट में खाला (मौसी) की कुछ खबर नहीं होगी। ममेरी चचेरी बहन के ब्याह का कोई समाचार नहीं होगा। फोन से होने वाली बातों में दादा-दादी की दुआएं नहीं होंगी। फिर वही बात आई कि हम करें भी तो क्या? इस युग में विज्ञान का विकास एक सुखद एहसास है और हमारी सोच भी इसके साथ है मगर ये भी सच है कि इन तरक्की के दौर में पुरानी चीजों का पीछे छूट जाना बहुत सालता है।फोन और इंटरनेट ने विश्व को सिकोड़ कर इतना छोटा कर दिया है कि लोग उसे हाथों में लिये फिर रहे हैं। सलमा का विवाह नसीम से तय हो जाने का समाचार जब मोबाइल फोन से मिल रहा है तो फिर कोई किसी को चिट्ठी लिखने का कष्ट क्यों करे? ऐसे में संवेदनाओं का कम हो जाना हैरत में नहीं डालता, आज जरूर इस बात की जगह बनती है कि क्या संवेदनाओ को इस प्रकार टूटकर बिखरने देना चाहिये। अगर मैं कहूँ तो गलत नहीं होगा कि चिट्ठी लिखना केवल कला नहीं बल्कि अपने आप में भावुकता है। इसके माध्यम से हम लोगों के दिलों को अपनी ओर खींचने की वैज्ञानिक क्षमता रखते हैं और उससे आपसी संबंध मजबूत होते हैं जिसकी आज विश्व को बहुत ज़रूरत है।मेरा मानना है कि अगर मुर्दा हो चुके सम्बन्धों को पत्रों के माध्यम से जीवित किया जाए तो शायद इससे सुन्दर माध्यम कोई और नहीं हो सकता। हमारे दिल में रह-रह कर यही बात उभर कर आती है कि अगर हम तकनीक के तारों के साथ साथ पत्र के माध्यम से भी अपनी संवेदनाओं के धागों को टूटने से बचा सकें तो रिश्तों की तस्वीर और खूबसूरत बन सकती है।

लेखक
नज्जमुसाकिब अब्बासी नदवी
सामाजिक कार्यकर्ता
रज्जदोपुर, गाजीपुर उप्र.

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